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Om Anandmay Om Shantimay's avatar

Dear Sister I P( S I T A): here is a gift of God for your supreme welfare:

क्या आज तक आप प्रमाणिक रूप से जानते थे कि हम सब परमात्मा के अंश हैं ?

श्रीमद्भगवद्गीता 15.7

श्लोक:  

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।  

मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥

संक्षेप :  

हर जीवात्मा सनातन रूप से परमात्मा का ही अंश है। यह आत्मा मन और इंद्रियों के साथ प्रकृति में स्थित होकर संसार में संघर्ष करती है।

व्याख्या :

भगवान इस श्लोक में उद्घोष करते हैं कि प्रत्येक जीवात्मा उनका ही सनातन अंश है। आत्मा मूलतः दिव्य और शुद्ध है, परंतु जब वह प्रकृति के संसर्ग में आती है, तब मन और इंद्रियों के माध्यम से संसार के विषयों में उलझ जाती है। यह उलझाव उसे कर्मबंधन में बाँध देता है और वह जन्म-मरण के चक्र में फँस जाती है। इस श्लोक का सार यह है कि हमारी आत्मा की वास्तविक पहचान परमात्मा से जुड़ी हुई है, और जीवन का परम उद्देश्य उसी परम स्रोत की ओर लौटना है।

🕊️ शरणागति कैसे हो?  

शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।  

आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।  

यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺

Om Anandmay Om Shantimay's avatar

Dear Sister you say “ Disagreeing is Good” I disagree with this thought 🙂 lol.

I have a gift of God for you, if you can read it in Hindi so good otherwise please get it translated into English through Google and read it seriously, and share with me what elixir have you extracted from this message of God for you:

भगवान की गोद में कौन से भक्त रहते हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १२, श्लोक ८

 सारांश :  

"मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।  

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥"

भगवान कहते हैं—“हे ! तू अपना मन मुझमें लगा और अपनी बुद्धि भी मुझमें अर्पित कर। तब तू निःसंदेह मुझमें ही निवास करेगा।”

 व्याख्या :  

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के भक्तियोग अध्याय से है, जहाँ भगवान उस भक्त की स्थिति बताते हैं जो सम्पूर्ण समर्पण के साथ जीता है।  

- “मन मुझमें लगाना” का अर्थ है कि हर भावना, विचार और स्मृति को भगवान की ओर मोड़ देना।  

- “बुद्धि मुझमें अर्पित करना” का अर्थ है कि अपने निर्णय और तर्क को भी ईश्वर की इच्छा में समर्पित कर देना।  

जब यह समर्पण पूर्ण हो जाता है, तब भक्त भगवान की गोद में ही निवास करता है—न केवल मृत्यु के बाद, बल्कि इसी जीवन में भी। यह स्थिति निःसंदेह है।

🕊️ शरणागति कैसे हो?  

शरणागति का अर्थ है — अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित करते हुए, निरंतर उनके नाम का ध्यान और जप करना, और जीवन को संयम, ब्रह्मचर्य तथा निष्कामता से जीना।  

आप प्रभु के दिव्य नाम "ॐ आनन्दमय ॐ शान्तिमय" का निरंतर, ध्यानपूर्वक जप करें — प्रातः से रात्रि तक, अपने सभी सत्कर्मों के साथ।  

यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है — इसी जन्म में दिव्यता को प्राप्त करें, यह अमूल्य अवसर न गँवाएँ। 🌺

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